Sadhana Shahi

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गुमनाम (नज़्म) प्रतियोगिता हेतु-01-Jun-2024

गुमनाम (नज़्म) प्रतियोगिता हेतु

सिसकियों के समंदर में मैं डूबती जा रही थी, गुमनामी के अंँधेरों में खो गई थी ज़िंदगी ।

दिल में रूदन चेहरे पर मुस्कान लिए थी, इसके अस्तित्व के लिए कर रही थी बंदगी।

जो बड़े अज़ीज़ थे उन्हें भूल रही थी , नीठि का सम्मान कर सजो रही हूँ पन्नगी।

हालात जब नाज़ुक हुए साए भी साथ छोड़ दिये, ढलती हुई शाम हो गई है मेरी तिश्नगी।

हम में जीने वाली मैं के बीच में है खो गई, पूनम की चांँदनी को वो कह रहे हैं गंदगी।

चार दिन की ज़िंदगी को फ़रेब से हैं भर दिए, फरेब ही जनमा रहे जब भी हैं जाते ज़चगी।

एक सज़ा की भांँति अब जिंदगी लगने लगी, हर रंग है फीका पड़ा चहुँ ओर है दरिंदगी।

साधना शाही, वाराणसी

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2 Comments

Gunjan Kamal

03-Jun-2024 01:05 PM

👏🏻👌🏻

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RISHITA

01-Jun-2024 07:29 PM

V nice

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